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दुर्गा चालीसा

दुर्गा की चालीस पदों की हिन्दी स्तुति - उनके रूप, उनके शक्तिपीठ और उनके द्वारा वध किए गए असुरों का वर्णन।

हिन्दी40 चौपाईभणिता

गीता प्रेस, गोरखपुर की श्रीदुर्गाचालीसा, श्रीविन्ध्येश्वरीचालीसा (कोड 1991), पृ. 3-16 का पाठ, शब्दशः और उसी की वर्तनी में, पृष्ठों के चित्रों से मिलाकर; गीता प्रेस की श्रीदुर्गाचालीसा (कोड 1033) में भी यही शब्द हैं। प्रचलित डिजिटल पाठ (sanskritdocuments.org का durga40), जो सितम्बर 2026 तक यहाँ लिया गया था और अनेक रिकॉर्डिंग में सुनाई देता है, लगभग एक दर्जन स्थानों पर भिन्न है। उसके पाठ, कोष्ठक में यहाँ का पाठ: 1 नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी (नमो नमो अंबे दुख हरनी); 5 शक्ति लै कीना (सक्ति लय कीन्हा); 10 धरयो (धरा); 11 हिरण्याक्ष (हिरनाकुस - हिरण्यकशिपु, प्रह्लाद की कथा का असुर); 14 न जात (न जाय); 15 मातंगी अरु धूमावति (मातंगी धूमावति); 23 कालिका (काली को); 25 अमरपुरी अरु बासव लोका, तब महिमा (अमर पुरी औरों सब लोका, तव महिमा); 30 काम अरु क्रोध (काम क्रोध); 32 का मरम (को मरम); 33 हुई (ह्वै); 36 मोह मदादिक सब बिनशावें (रिपु मूरख मोहि अति डरपावै); 40 श्री दुर्गा चालीसा (दुर्गा चालीसा)। अन्यत्र durga40 मानक वर्तनी (शक्ति, शंकर, विराजै) छापता है जहाँ गीता प्रेस बोलचाल के रूप (सक्ति, संकर, बिराजै) छापता है; उस पृष्ठ पर एक अनंकित पुराना मूल पाठ भी है, जिसकी वर्तनी फिर भिन्न है।

जो यहाँ नहीं है

  • गीता प्रेस की पुस्तिका में इस स्तुति के बाद छपी श्रीविन्ध्येश्वरीचालीसा और अम्बे गौरी की आरती (जय अंबे गौरी) - ये पृथक् रचनाएँ हैं।

यह लिप्यन्तरण देवनागरी लिपि का अक्षर-प्रतिअक्षर रूपान्तर है, उच्चारण-निर्देश नहीं: अन्तर्निहित 'अ' सदा लिखा जाता है (हनुमान → hanumāna), जिससे परदे पर प्रत्येक अक्षर के नीचे ठीक एक शब्दांश आता है। हिन्दी/अवधी पाठ के लिए ISO 15919 प्रयुक्त है, क्योंकि IAST में ड़ के लिए कोई चिह्न नहीं है - इसलिए यहाँ कृपा = kr̥pā और बड़ाई = baṛāī।

पद 1 / 41पूर्ण पाठ: 0
चौपाई 1

नमो नमो दुर्गे सुख करनी

नमो नमो अंबे दुख हरनी

namo namo durge sukha karanī

namo namo aṁbe dukha haranī

सुख करने वाली दुर्गा को नमन, नमन; दुःख हरने वाली अम्बा को नमन, नमन।

दुर्गा चालीसा · 1/41

चौपाई 2

निरंकार है ज्योति तुम्हारी

तिहूँ लोक फैली उजियारी

niraṁkāra hai jyoti tumhārī

tihūm̐ loka phailī ujiyārī

आपकी ज्योति निराकार है, और उसका उजाला तीनों लोकों में फैला हुआ है।

चौपाई 3

ससि ललाट मुख महा बिसाला

नेत्र लाल भृकुटी बिकराला

sasi lalāṭa mukha mahā bisālā

netra lāla bhr̥kuṭī bikarālā

आपके ललाट पर चन्द्रमा है और मुख महाविशाल; नेत्र लाल और भृकुटि विकराल है।

चौपाई 4

रूप मातु को अधिक सुहावे

दरस करत जन अति सुख पावे

rūpa mātu ko adhika suhāve

darasa karata jana ati sukha pāve

हे माता, आपका रूप अत्यन्त सुहावना है; दर्शन करने वाले जन बड़ा सुख पाते हैं।

चौपाई 5

तुम संसार सक्ति लय कीन्हा

पालन हेतु अन्न धन दीन्हा

tuma saṁsāra sakti laya kīnhā

pālana hetu anna dhana dīnhā

आपने संसार को अपनी शक्ति में लय किया, और उसके पालन के लिए अन्न और धन दिया।

चौपाई 6

अन्नपूर्णा हुई जग पाला

तुम ही आदि सुंदरी बाला

annapūrṇā huī jaga pālā

tuma hī ādi suṁdarī bālā

अन्नपूर्णा होकर आपने जगत का पालन किया; आप ही आदि सुन्दरी बाला हैं।

चौपाई 7

प्रलयकाल सब नासन हारी

तुम गौरी सिव संकर प्यारी

pralayakāla saba nāsana hārī

tuma gaurī siva saṁkara pyārī

प्रलयकाल में सबका नाश करने वाली आप ही हैं; आप गौरी हैं, शिवशंकर की प्रिया।

चौपाई 8

सिवजोगी तुम्हरे गुन गावें

ब्रह्मा बिष्णु तुम्हें नित ध्यावें

sivajogī tumhare guna gāveṁ

brahmā biṣṇu tumheṁ nita dhyāveṁ

शिव और योगी आपके गुण गाते हैं; ब्रह्मा और विष्णु नित्य आपका ध्यान करते हैं।

चौपाई 9

रूप सरस्वति को तुम धारा

दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन्ह उबारा

rūpa sarasvati ko tuma dhārā

de subuddhi r̥ṣi muninha ubārā

आपने सरस्वती का रूप धारण किया और सुबुद्धि देकर ऋषि-मुनियों का उद्धार किया।

चौपाई 10

धरा रूप नरसिंह को अंबा

परगट भई फाड़ कर खंबा

dharā rūpa narasiṁha ko aṁbā

paragaṭa bhaī phāṛa kara khaṁbā

हे अम्बा, आपने नरसिंह का रूप धरा और खम्भा फाड़कर प्रकट हुईं।

चौपाई 11

रच्छा करि प्रहलाद बचायो

हिरनाकुस को स्वर्ग पठायो

racchā kari prahalāda bacāyo

hiranākusa ko svarga paṭhāyo

आपने प्रह्लाद की रक्षा करके उसे बचाया, और हिरण्यकशिपु (हिरनाकुस) को स्वर्ग भेजा।

चौपाई 12

लछमी रूप धरो जग माहीं

श्री नारायन अंग समाहीं

lachamī rūpa dharo jaga māhīṁ

śrī nārāyana aṁga samāhīṁ

आपने जगत में लक्ष्मी का रूप धारण किया और श्रीनारायण के अंग में समाईं।

चौपाई 13

छीर सिंधु में करत बिलासा

दया सिंधु दीजै मन आसा

chīra siṁdhu meṁ karata bilāsā

dayā siṁdhu dījai mana āsā

आप क्षीरसिन्धु में विलास करती हैं; हे दयासिन्धु, मेरे मन की आशा पूरी कीजिए।

चौपाई 14

हिंगलाज में तुम्हीं भवानी

महिमा अमित न जाय बखानी

hiṁgalāja meṁ tumhīṁ bhavānī

mahimā amita na jāya bakhānī

हिंगलाज में आप ही भवानी हैं; आपकी महिमा अमित है और बखानी नहीं जाती।

चौपाई 15

मातंगी धूमावति माता

भुवनेस्वरि बगला सुख दाता

mātaṁgī dhūmāvati mātā

bhuvanesvari bagalā sukha dātā

आप मातंगी और धूमावती माता हैं; आप भुवनेश्वरी और बगला हैं, जो सुख देती हैं।

चौपाई 16

श्री भैरव तारा जग तारिनि

छिन्नभाल भव दुःख निवारिनि

śrī bhairava tārā jaga tārini

chinnabhāla bhava duḥkha nivārini

आप भैरवी और जगत को तारने वाली तारा हैं; छिन्नमस्ता रूप में आप भव के दुःख का निवारण करती हैं।

चौपाई 17

केहरि बाहन सोह भवानी

लांगुर बीर चलत अगवानी

kehari bāhana soha bhavānī

lāṁgura bīra calata agavānī

हे भवानी, आप केहरि पर सुशोभित हैं, और लांगुर वीर आगे चलकर अगवानी करते हैं।

चौपाई 18

कर में खप्पर खड़ग बिराजै

जाको देख काल डर भाजै

kara meṁ khappara khaṛaga birājai

jāko dekha kāla ḍara bhājai

आपके हाथों में खप्पर और खड्ग सुशोभित हैं; जिन्हें देखकर काल भी डरकर भाग जाता है।

चौपाई 19

सोहै अस्त्र और तिरसूला

जाते उठत सत्रु हिय सूला

sohai astra aura tirasūlā

jāte uṭhata satru hiya sūlā

आपके अस्त्र और त्रिशूल शोभित हैं, जिनसे शत्रु के हृदय में शूल उठता है।

चौपाई 20

नगरकोट में तुम्ही बिराजत

तिहूँ लोक में डंका बाजत

nagarakoṭa meṁ tumhī birājata

tihūm̐ loka meṁ ḍaṁkā bājata

नगरकोट में आप ही विराजती हैं; तीनों लोकों में आपका डंका बजता है।

चौपाई 21

सुंभ निसुंभ दानव तुम मारे

रक्त बीज संखन संहारे

suṁbha nisuṁbha dānava tuma māre

rakta bīja saṁkhana saṁhāre

आपने शुम्भ और निशुम्भ दानवों को मारा, और रक्तबीज तथा शंख का संहार किया।

चौपाई 22

महिषासुर नृप अति अभिमानी

जेहि अघ भार मही अकुलानी

mahiṣāsura nr̥pa ati abhimānī

jehi agha bhāra mahī akulānī

महिषासुर नृप अत्यन्त अभिमानी था, जिसके पाप के भार से पृथ्वी व्याकुल हो उठी।

चौपाई 23

रूप कराल काली को धारा

सेन सहित तुम तिहि संहारा

rūpa karāla kālī ko dhārā

sena sahita tuma tihi saṁhārā

आपने काली का कराल रूप धारण किया और सेना सहित उसका संहार किया।

चौपाई 24

परी गाढ़ संतन पर जब जब

भई सहाय मातु तुम तब तब

parī gāṛha saṁtana para jaba jaba

bhaī sahāya mātu tuma taba taba

जब-जब सन्तों पर कठिनाई पड़ी, हे माता, तब-तब आपने सहायता की।

चौपाई 25

अमर पुरी औरों सब लोका

तव महिमा सब रहै असोका

amara purī auroṁ saba lokā

tava mahimā saba rahai asokā

अमरपुरी और अन्य सब लोक - आपकी महिमा से वे सब अशोक बने रहते हैं।

चौपाई 26

ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी

तुम्हें सदा पूजें नरनारी

jvālā meṁ hai jyoti tumhārī

tumheṁ sadā pūjeṁ naranārī

ज्वाला में आपकी ही ज्योति है; नर और नारी सदा आपको पूजते हैं।

चौपाई 27

प्रेम भक्ति से जो जस गावै

दुख दारिद्र निकट नहि आवै

prema bhakti se jo jasa gāvai

dukha dāridra nikaṭa nahi āvai

यह पद कहता है कि जो प्रेम और भक्ति से आपका यश गाता है, उसके निकट दुःख और दरिद्रता नहीं आते।

पाठ का कथन

यह वचन स्तोत्र का है। AstroZivi किसी स्वास्थ्य-लाभ या परिणाम का दावा नहीं करता।

चौपाई 28

ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई

जन्म मरन ताको छुटि जाई

dhyāve tumheṁ jo nara mana lāī

janma marana tāko chuṭi jāī

यह पद कहता है कि जो मनुष्य मन लगाकर आपका ध्यान करता है, उसका जन्म-मरण छूट जाता है।

पाठ का कथन

यह वचन स्तोत्र का है। AstroZivi किसी स्वास्थ्य-लाभ या परिणाम का दावा नहीं करता।

चौपाई 29

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी

जोग न हो बिन सक्ति तुम्हारी

jogī sura muni kahata pukārī

joga na ho bina sakti tumhārī

योगी, देवता और मुनि पुकारकर कहते हैं कि आपकी शक्ति बिना योग होता ही नहीं।

चौपाई 30

संकर आचारज तप कीन्हो

काम क्रोध जीति सब लीन्हो

saṁkara ācāraja tapa kīnho

kāma krodha jīti saba līnho

शंकर आचार्य ने तप किया और काम तथा क्रोध दोनों को जीत लिया।

चौपाई 31

निसिदिन ध्यान धरो संकर को

काहु काल नहि सुमिरो तुमको

nisidina dhyāna dharo saṁkara ko

kāhu kāla nahi sumiro tumako

उन्होंने निशिदिन शंकर का ध्यान धरा, और किसी काल में आपका स्मरण नहीं किया।

चौपाई 32

सक्ति रूप को मरम न पायो

सक्ति गई तब मन पछितायो

sakti rūpa ko marama na pāyo

sakti gaī taba mana pachitāyo

वे शक्ति-रूप का मर्म न पा सके; जब शक्ति चली गई तब मन पछताया।

चौपाई 33

सरनागत ह्वै कीर्ति बखानी

जय जय जय जगदंब भवानी

saranāgata hvai kīrti bakhānī

jaya jaya jaya jagadaṁba bhavānī

वे शरणागत हुए और कीर्ति का बखान किया - जय जय जय जगदम्ब भवानी।

चौपाई 34

भई प्रसन्न आदि जगदंबा

दई सक्ति नहि कीन्ह बिलंबा

bhaī prasanna ādi jagadaṁbā

daī sakti nahi kīnha bilaṁbā

आदि जगदम्बा प्रसन्न हुईं और बिना विलम्ब किए शक्ति दे दी।

चौपाई 35

मोको मातु कष्ट अति घेरो

तुम बिन कौन हरे दुख मेरो

moko mātu kaṣṭa ati ghero

tuma bina kauna hare dukha mero

हे माता, मुझे अत्यन्त कष्ट ने घेर लिया है; आपके बिना मेरा दुःख कौन हरेगा?

चौपाई 36

आसा तृस्ना निपट सतावै

रिपु मूरख मोहि अति डरपावै

āsā tr̥snā nipaṭa satāvai

ripu mūrakha mohi ati ḍarapāvai

आशा और तृष्णा मुझे निपट सताती हैं, और मूर्ख शत्रु मुझे अत्यन्त डराता है।

चौपाई 37

सत्रु नास कीजै महरानी

सुमिरौं एकचित तुमहि भवानी

satru nāsa kījai maharānī

sumirauṁ ekacita tumahi bhavānī

हे महारानी, शत्रुओं का नाश कीजिए; हे भवानी, मैं एकचित्त होकर आपका स्मरण करता हूँ।

चौपाई 38

करौ कृपा हे मातु दयाला

ऋद्धि सिद्धि दे करहु निहाला

karau kr̥pā he mātu dayālā

r̥ddhi siddhi de karahu nihālā

हे दयालु माता, कृपा कीजिए; ऋद्धि-सिद्धि देकर मुझे निहाल कीजिए।

चौपाई 39

जब लगि जियौं दयाफल पाऊँ

तुम्हरौ जस मैं सदा सुनाऊँ

jaba lagi jiyauṁ dayāphala pāūm̐

tumharau jasa maiṁ sadā sunāūm̐

जब तक मैं जीऊँ, आपकी दया का फल पाऊँ, और मैं सदा आपका यश सुनाता रहूँ।

चौपाई 40

दुर्गा चालीसा जो कोई गावै

सब सुख भोग परम पद पावै

durgā cālīsā jo koī gāvai

saba sukha bhoga parama pada pāvai

यह पद कहता है कि जो कोई दुर्गा चालीसा गाता है, वह सब सुख भोगता है और परमपद प्राप्त करता है।

पाठ का कथन

यह वचन स्तोत्र का है। AstroZivi किसी स्वास्थ्य-लाभ या परिणाम का दावा नहीं करता।

भणिता 1

देवीदास सरन निज जानी

करहु कृपा जगदंब भवानी

devīdāsa sarana nija jānī

karahu kr̥pā jagadaṁba bhavānī

देवीदास अपने को आपकी शरण में जानते हैं; हे जगदम्ब भवानी, कृपा कीजिए।

आपका स्थान इसी उपकरण में सुरक्षित रहता है। पाठ पूर्ण करने पर वह जप काउंटर में एक आवृत्ति के रूप में गिना जाता है, जिससे आज का स्मरण-संदेश नहीं भेजा जाएगा।

परम्परा में नवरात्रि की नौ रातों तथा मंगलवार और शुक्रवार को पाठ किया जाता है। एक पूर्ण पाठ नीचे के काउंटर पर एक आवृत्ति गिना जाता है।

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यहाँ दिया गया मूल पाठ सार्वजनिक अधिकार में है और यथावत् प्रस्तुत है; अंग्रेज़ी और हिन्दी अर्थ AstroZivi के अपने हैं, किसी प्रकाशित अनुवाद की नकल नहीं। जहाँ कोई पद किसी फल का वचन देता है, वह वचन स्तोत्र का है - AstroZivi किसी स्वास्थ्य-लाभ या परिणाम का दावा नहीं करता। शैक्षणिक उद्देश्य हेतु।